बचपन तो देखों इन मासूमों का
अक्सर बचपन की जिम्मेदारी का बोझ
ऐसे मासूम के कंधो पर आ जाता है,जिनको
जिंदगी के इम्तिहान से रूबरू होना तक नहीं
आता।
मगर परिस्थिति और परिवार की जिम्मेदारी
उनको हर हाल में जीना सिखा देती है।
मर जाती है सारी ख़्वाहिश,
शिक्षा पाने की तमन्ना इन मासूमों के दिल
में ही खत्म हो जाती है।
खो जाता है बचपन इनका जिम्मेदारी के
बोझ तले।
कहते नहीं कुछ भी किसी समझदार हो जाते
इतने गम अपना सारा मुस्कुराहट के पीछे छुपा
जाते।
जानते हुए सब कुछ फिर भी इनकी सूनी आंखो में
एक दिन बड़ा इंसान बन सफल हो इस दुनिया पर
छा जाने का अरमां जगते हैं।