जब तराजू में औहदा और दौलत की तुलना है होती
जीत जाती दौलत औहदा हमेशा की तरह हार जाता
घुटने टेक देती इंसानियत दौलत सिर उठा कर जीती
हावी होती इस कदर अपनों को भूला देती,घरों में
दीवारें ये करा देती,
शिक्षा,रोजगार,नौकरी रिश्वत का रूप ले ख़ुद पर
बड़ा इठला रही।
अमीरों की तिजोरी में शान बढ़ा जाने कितना घमंड
दिखाती।
गरीब को हर लम्हा ये परख़ती ना उम्मीद है उनकों
करा रही।
बड़ी डिग्री हासिल किये युवा को नौकरी पेशा से
वंचित करा रही।
दौलत की ताक़त तो देखों अपनी एहमियत का कितना
एहसास करा रही,
न रहने दे सुकूँ से इंसानों को अपना रूतबा दिखा रही
दौलत की ताक़त है ये दौलत की ताक़त अपनी उंगली पर
इंसानों को नचा रही,
ग़म हो या हो ख़ुशी का माहौल हर तरह से अपना
जलवा दिखा रही,
गिरा देती ईमान किसी का इस कदर ललचा देती इंसान को
दौलत ही ख़ुद को ईश्वर का दर्जा दिला रही।
इंसान की जिंदगी बन बैठी ये दौलत दिन रात की नींद
ये उनकी उड़ा रही ।
दौलत की ताक़त है देखो इंसान का खून पसीना बहा रही।
किसी को घर से इतना दूर करती सात समंदर पार पहुँचा देती
दौलत की ताक़त भी बड़ी निराली हर तपके के इंसान को अपना गुलाम बना रही।
वाह री दौलत तेरी ताक़त किसी को आसमां तक किसी को जमीं पर ला रही।