माना कि ज़िन्दगी ख़ुशियों से गुलज़ार है फिर
भी कतरे-कतरे में जिन्दगी बिताने पर मजबूर
हो जाया करते हैं,
जिन ख़ुशियों की ख़ातिर हम लम्हा लम्हा
सुकँ की तलाश किया करते हैं,
लेकर ज़िन्दगी के बदलते हर दौर की अनुभूति
ज़िन्दगी के गणित का समीकरण किया करते हैं,
कितनी धूप रूपी संघर्ष का सामना किया कितनी
ख़्वाहिशें हकीकत में बदली सबका हिसाब
सारी ज़िन्दगी लगाया करते हैं,
सिमट कर रह गई ज़िन्दगी इसी कशमकश में
क्या यही ज़िन्दगी है सही मायनों में ‘तरूणा’ तेरी,