भोले से मन की भोली सी तरूणा की ख़्वाहिश है
बस इतनी सी,
जब भी हकीकत के साज़ पर उम्मीद की कोई
धुन हम बजायें तो ग़मों के सुर सिमट जाये और
ख़ुशी के सरगममय सुरों से संगीतमय रूपी जीवन
का वातावरण शुद्ध हो जाये।
ग़र लगते ये ख़्वाहिशों के सुर बेसुरे तो जीवन
बे-ताली सा लगता है।
ग़मो के सुर हो या ख़ुशी के सुर ग़र एक बार सुर
रूपी हुनर लय रूपी नसीब बिगड़ जाये तो
जीवन का साज़ भी टूटा सा लगता है।