एक संघर्ष
आजाद पंछी सा हुआ करता था वो इंसान कभी
दुनियादारी से बेखबर हो अपनी ही दुनिया में खोया
रहता था कभी,
हुआ करता था हकीकत से अंजान कभी रिश्तो की
समझ न हुआ करती थी कभी,
जिन्दगी के संघर्ष भरे दौर से सामना न किया था कभी
देखी न थी कभी उसने दुनिया की कड़क धूप,
आया जिन्दगी में एक मोड़ ऐसा बदलते हालातों ने
उसके जीवन का समीकरण का गणित ही बदल डाला
जो जिया करता था कभी राजकुमारों सी जिन्दगी
दब गया परिवार की जिम्मेदारी के बोझ तले
दो वक्त की रोटी कमाने की खातिर निकल पड़ा परदेश
छोड़ परिवार को जाने की मजबूरी दे न उसका दिल गवाही
रहता न था कभी परिवार की नजरों से ओझल
लेना पड़ा उसे इतना बड़ा कदम,चल पड़े कदम उसके अंजान
शहर की गलियों की ओर।
बड़ा इंसान बनने का सपना लिए वो अपने माँ पापा का जिगर
का टुकड़ा हुआ करता था कभी मजबूर उनकी नजरों से ओझल होने को मजबूर,
हो काश कोई करिश्मा ऐसा मेहनत उसकी रंग ले आये
जो ख्वाब उसके माँ पापा ने देखें उनको वो पूरा कर पाये।
यही काश की उम्मीद लिए निकल पड़ा ख्वाब हकीकत में बदलने को।