प्यारी सखी जिन्दगी
कष्टों को सहन करते करते जिन्दगी
हमारी पीड़ा सखी बन गई,
हमारे संघर्ष भरी दास्ताँ सुनी तो हमारे संग
फूट फूट कर रो पड़ी।
व्यथा में हमारी रोई इतना कि जग में परिहास
का कारण बन गई,
जागी फिर से जीने की तमन्ना तो दुनिया की
नफ़रत भरी निगाहों में खटक उपहास
का कारण बन गई,
दर्द के मन रूपी पंछी तुझे मैं सहलाऊंगी
सुनकर जख्मों के नयन रूदन की अश्रु से
भर गई,
कश्ती उतरी जिन्दगी को संग लिए हमारी
कष्ट रूपी समंदर में,
टूटी फूटी कश्ती हमारी जानें कैसे पार लगे
ज़िन्दगी ने थाम कर हाथ हमारा बदनसीबी
पर हमारी झर झर अश्रु बहा पड़ी,
देखा सामने हमने अक्स अपना तो इस छोटी
उम्र में ही शख्सियत हमारी धुँधला सी गई।
कतरे कतरे में कट रहा इस कदर सफ़र कि
जिन्दगी भी हमसे तंग हो हमसे ही
नजरें चुराने लगी।