मनोरम ख़्वाब
देखा बड़ा ही मनोरम ख़्वाब अर्ध रात्रि कि
चल पड़े हैं रूके कदम,
मानों आसमां को छूने को उठ पड़े है कदम
असहनीय पीड़ा से मिला छुटकारा ये सोच
मन उत्साहित हो उठा,
निकल पड़े अंजान राहों पर दुनिया से हो बेखबर
सैर करने,
कभी दौड़ते कभी उछल कर पेड़ की टहनियों
को पकड़ने की कोशिश करते।
कभी खिलखिलाते कभी फिर कदम चल पड़ते
मानों सारी जिन्दगी उस एक पल में जी लेना चाहते
अचानक हुआ खटका तेज हवा में खुला दरवाज़ा
बड़ी जोर की हुई आवाज़ ने ख्वाब से जगा दिया
हुआ सवेरा टूटा भ्रम देखा वहीं रूके हुऐ थे कदम।
बहला कर अपने ख़्वाब को हकीकत से रूबरू करा
दिया।