वो दिन था बैसाख का वो रात्रि थी पूर्णिमा की
माता महामाया के गर्भ से लुम्बिनी ग्राम के
शुद्धोधन के आँगन में जन्म हुआ सिद्धार्थ का
हुआ विवाह यशोधरा से हुआ पुत्र रत्न राहुल की
त्याग कर ग्रहस्त जीवन दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हेतु
तप करने निकल पड़े वो राजमहल से
वर्षों की तपस्या के बाद बोधगया के पीपल के
वृक्ष के नीचे बुद्धत्व की हुई प्राप्ति बुद्ध को तो
वो शुभ दिन था बैसाख का।
कहलाया वो बोधि वृक्ष जहाँ मिला ज्ञान का भंडार था
जिस दिन त्यागा देह बुद्ध ने पूर्णिमा थी बैसाख की
विधि का लेख था बड़ा संजोगपूर्ण तिथि का कैसा
अदभुत भाव,
एक समान समझने वाले न्याय प्रिय बुद्ध का जीवन
गहरी छाँप छोड़ जाता है
जीवन के हर पहलु को उनके विचारों में ढ़ालने की
सीख दे जाता है।