साँझ ढ़ले की रोटी
वो मिट्टी का चूल्हा वो उपले की आँच पर
अम्मा के हाथ की साँझ ढ़ले की मीसी रोटी
वो कच्चे आम की चटनी और वो ताजा मट्ठा
आज भी याद आता हैं
याद है वो अम्मा की चूल्हे पर झुकी पीठ
फूंकनी से बुझती आग को सुलगाने की कोशिश
कर धुयें को दबाने की कोशिश करती है
कभी हाथ से तो कभी चिमटे से कच्ची रोटी को
सेकने की कोशिश करती है।
बिठा कर पास चूल्हे के गर्म गर्म रोटी को परोस
कर खिलाना अम्मा का याद आता है।
कभी हाथ के सहारे से तो कभी चकले बेलन के
सहारे से वो हर एक रोटी का करारापना याद
आता है।
वो अम्मा का चोका चूल्हा वो अम्मा के बासन
चिमटा फूंकनी वो अम्मा का घुमावदार चकला
बेलन,वो टिमटीमाती लालटेन की लौ से हल्की
रोशनी का आना याद आता है जब भी जेहन में
मन मार्मिकता से भर जाता है
फिर वही बचपन की साँझ ढ़ले की अम्मा के हाथ
की रोटी की याद ताजा हो जाती है।