पृथ्वी के सौन्दर्य हो, जीवन का आधार है तुमसे
शीतल छाया भी तुम्हारी देन सहते स्वंय हर
मौसम की पीड़ा, बिना मुकुट के तुम हो राजा
करते हम इंसानों की रक्षा, लगते हो तुम बेहद
मनमोहक जंगल हो या गाँव या हो शहर तुम्हारे
बिना न सब कुछ सूना तुमसे है इस धरा की शोभा
पक्षियों के तुम पर ही घरौंदे बचा लेते उनका जीवन
जहाँ तुम होते शीतलता की लहर है चल पड़ती,
बरसता सावन सूखी हरियाली फिर लहलहाती
ताल तलैया है भर जाते इस धरा के अवतारी तुम हो
खुशहाली का द्वार खुलते तुमसे हैं
स्वच्छ स्वास्थ तुमसे है मिलता श्रम है सारा तुम हर लेते
फूल फल सब्जी तुम हमको हो देते बदले में हमसे कुछ न
लेते। करते हो नित्य उपकार हम सभी पर सेवा भाव के
प्रतिक हो तुम प्रिय पेड़।