जाने कैसा है तुझको हमसे बैर क्यो निभाये हमसे
शत्रुता इतनी,बिगड़ गई जीवन शैली दिनचर्या
हुआ तो तू हम पर इतना हावी कि सफलता की
सीढियां हम न चढ़ पाते, जागरूकता की कमी के
कारण आलस तू हमसे रूबरू हो हममें सुस्ती है लाता,
तेरे कारण हर निर्धारित कार्य विस्मृत है हो जाता ।
कभी देर से जागना सोना तेरी इन्ही देन के कारण
किसी न किसी रूप में तू हमें क्यो इतना सताता।
लगा कर रूकावट कार्य में हमारे उन्नति के मार्ग
अवरुद्ध कर तू हमें है भ्रमित करता।
चला जा,ओ आलस अब तो थोड़ा सा हम पर भी
रहम दिखला जा।
ज़िन्दगी पास तो आ
गुज़ारिश है तुझसे ऐ ज़िन्दगी पास तो आ
माना गुजर रही है जिन्दगी बदनसीबी के
साये तले।
पत्थर सा हुआ दिल अब,धुँध है छाई खुशियों
की लहरों पर।
ग़मो की जाने कैसी बाढ़ है आई,ख़्वाहिशें
हमारी साथ बहा ले गई।
मिल जाये किनारा ख़ुशियों को हमारी भी
एक दफा हम पर तू मेहरबां हो जा जरा सी,
हो न जाये मायूस ये तरूणा तुझसे ऐ जिन्दगी
बस ग़मों थोड़ा सा ठहराव ही चाहती है।
ऐ क़लम
जो हर इंसान के बेबसी भरे आंसू पोंछ उनकी खामोशी की आवाज़ बन उनके हक दिलाने की ताकत बन उनका सहारा बनती है क़लम,छोटी छोटी कमी हो या बड़े से बड़ा हुनर सामने लेकर आने की ताकत रखती है क़लम, धुँध में खोती ज़िन्दगी के हर पड़ाव प्रेम भाव,दुखद-भाव,सुखद-भाव हर भाषा में अल्फाज़ों को ढ़ला देने की ताकत रखती है क़लम,नफ़रतों, मजहबी भेदभाव को दिलों से मिटा कर हर दिल में शिष्टाचार उजागर करने की ताकत रखती है क़लम, वतन के हित हेतु हर देशप्रेमी में एक सच्चा फौजी बनने की ऊर्जा का संचार करने हेतु सबक सच्चाई ईमानदारी सशक्त दृढ़ता का सिखलाकर,
कोरे काग़ज़ पर एक नये सुनहरे अक्षरों में वर्णित हो इतिहास को आयाम देने के लिए प्रेरित करने की ताकत रखती है क़लम,
तकदीर बदलती है
कैसा ग़म करना जीवन में तकलीफ तो
आती-जाती रहती हैं
क्यो रोना अपने कर्मो को जिन्दगी फिर
एक अवसर देती है
क्यो बैठना थक हार कर जैसा भी खेल है
इन संघर्षो का बस इम्तिहान देते जाना है
तकदीर का क्या है वो तो क्षण क्षण हाथ
की लकीरों सी बदलती रहती है
जय श्री राधे कृष्णा 🙏🏻
भाग्य भरोसे कुछ नहीं
याद रखना हमेशा आपका कर्म आपका हुनर
आपकी पहचान है।
कर न लेना विलुप्त अपने आत्म विश्वास को
भाग्य के लेख के अधीन।
बदल जाता है भाग्य का लेख भी ग़र अपने
कर्म लक्ष्य और आत्मविश्वास पर यकीं हो।
यूँ ही न बैठ जाना थक हार कर भाग्य से
अपने ग़र अपने हाथों की बंद मुट्ठी की
लकीरों पर यकीं हो,
जय श्री राधे कृष्णा 🙏🏻
साँझ ढ़ले की रोटी
साँझ ढ़ले की रोटी
वो मिट्टी का चूल्हा वो उपले की आँच पर
अम्मा के हाथ की साँझ ढ़ले की मीसी रोटी
वो कच्चे आम की चटनी और वो ताजा मट्ठा
आज भी याद आता हैं
याद है वो अम्मा की चूल्हे पर झुकी पीठ
फूंकनी से बुझती आग को सुलगाने की कोशिश
कर धुयें को दबाने की कोशिश करती है
कभी हाथ से तो कभी चिमटे से कच्ची रोटी को
सेकने की कोशिश करती है।
बिठा कर पास चूल्हे के गर्म गर्म रोटी को परोस
कर खिलाना अम्मा का याद आता है।
कभी हाथ के सहारे से तो कभी चकले बेलन के
सहारे से वो हर एक रोटी का करारापना याद
आता है।
वो अम्मा का चोका चूल्हा वो अम्मा के बासन
चिमटा फूंकनी वो अम्मा का घुमावदार चकला
बेलन,वो टिमटीमाती लालटेन की लौ से हल्की
रोशनी का आना याद आता है जब भी जेहन में
मन मार्मिकता से भर जाता है
फिर वही बचपन की साँझ ढ़ले की अम्मा के हाथ
की रोटी की याद ताजा हो जाती है।
याद आती है
याद आती है बहुत आपकी पापा
उस पल में जब जिन्दगी के विकट
परिस्थिति के इम्तिहान को देते हुए
थक जाते है, कशमकश भरे सवालों
से मन हमारा हमको ही बहुत परेशान
करता है,सुनता नहीं कोई हमारी तकलीफ
जैसे आप हमारे बोलने से पहले समझ
जाया करते थे।
आती है उस पल में आपकी याद जब हमें
सहारे की जरूरत होती है और आपसे
सहारा कोई नहीं होता।
याद आती है उस पल में आपकी याद पापा
जब आपसी निस्वार्थता वफादारी इस फरेब
के माहौल में।
याद आती है उस पल में आपकी जब सारी
दुनिया हमें बोझ समझ नफ़रत से देखती है
थक गई इस दुनिया से लड़ते लड़ते,
अपनी बिटिया तरूणा को आपकी दुनिया
में वापस बुला लो पापा।
रास्ता बुलाता है
रास्ता बुलाता है
हाथ थाम हमारा ख्वाबों से भरा रास्ता हमें बुलाता है
नादां सा मन हमारा हकीकत से रूबरू होकर भी
ख़्वाहिशों के साये तले ही रह जाना चाहता है।
भय लगता है अक्सर ख्वाबों को संजोने से
पर ख़्वाहिशों की अपनी दुनिया से नाता बड़ा
गहरा लगता है।
अक्सर मिलती है हकीकत की दुनिया से मायूसी
मगर ख़्वाहिशों की दुनिया से सुकँ भरा लम्हा
हसीन सा लगता है।
वो रास्ता हमें बुलाता है जहाँ ख़्वाहिशों की दुनिया
हमारी बसा करती है।
बड़े निस्वार्थ से लगते है ये ख्वाब ,इन्ही में खोये
रहना बड़ा अच्छा लगता है।
बुद्ध विचार शुद्ध विचार
वो दिन था बैसाख का वो रात्रि थी पूर्णिमा की
माता महामाया के गर्भ से लुम्बिनी ग्राम के
शुद्धोधन के आँगन में जन्म हुआ सिद्धार्थ का
हुआ विवाह यशोधरा से हुआ पुत्र रत्न राहुल की
त्याग कर ग्रहस्त जीवन दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हेतु
तप करने निकल पड़े वो राजमहल से
वर्षों की तपस्या के बाद बोधगया के पीपल के
वृक्ष के नीचे बुद्धत्व की हुई प्राप्ति बुद्ध को तो
वो शुभ दिन था बैसाख का।
कहलाया वो बोधि वृक्ष जहाँ मिला ज्ञान का भंडार था
जिस दिन त्यागा देह बुद्ध ने पूर्णिमा थी बैसाख की
विधि का लेख था बड़ा संजोगपूर्ण तिथि का कैसा
अदभुत भाव,
एक समान समझने वाले न्याय प्रिय बुद्ध का जीवन
गहरी छाँप छोड़ जाता है
जीवन के हर पहलु को उनके विचारों में ढ़ालने की
सीख दे जाता है।
हर समस्या का समाधान
अपने अंतर्मन के बंद दरवाज़े को खोल कर देखों
बड़े से बड़े विकट सकंट का समाधान मौजूद है
अपने अंतर्मन की गहराई में झाँक कर तो देखों
मिट जाये सब दुख दर्द कभी ईश्वरीय भक्ति का
मरहम लगा कर तो देखों।
मिलेगी हार न कभी अपने अंतर्मन में अपने ईश्वर
को बसा कर तो देखों।
बहुत हुए इस जग पर मेहरबान एक दफा शीश ईश्वर
के आगे झुकाकर तो देखों।
मिले न ग़र जीवन में सुख तो कहना एक दफा ईश्वर
को अपने अंतर्मन में शामिल करके तो देखों।
जय श्री राधे कृष्णा 🙏🏻