माँ की मोहब्बत
ख़ुशी से झूम उठी माँ जब बाल अवस्था में
जब पहला कदम हमारा जमीं पर आगे बढ़ा।
गद गद हुई माँ जब पहली दफा हमसे माँ शब्द सुना
जाते जब हम विद्यालय तो दही चीनी का शगुन
खिला कर भेजती माँ
हो जाती देर कभी घंटो दरवाज़े पर खड़ी राह
तकती हमारी माँ
देर रात तक परीक्षा के दिनों में जब हम पढ़ा करते
माँ भी साथ हमारे जगा करती,
अच्छी सेहत रहें हमारी हमेशा पौष्टिक आहार
बड़े प्रेम से बनाती माँ,
रहती व्यस्त पूरा दिन घर के कामों में थकावट की
शिकन चेहरे पर कभी न लाती माँ,
परीक्षा-फल के परिणाम के दिन हमारे घंटो
मंदिर में बैठी रहती माँ,
आते अव्वल तो हमसे ज्यादा फूली समाती माँ
रोज सवेरे उठ कर हमारी लम्बी उम्र की ईश्वर से
प्रार्थना करती माँ
सलाम है माँ तुम्हें बन सुरक्षा कवच हमारी इस धरती
पर आई माँ।
क्या पाया क्या खोया
दुनिया
इस दुनिया में आकर हमने क्या पाया क्या खोया
ये हम जानते हैं या हमारा दिल जानता हैं।
सहते हैं हम दर्द कितना ये हम जानते है या
हमारा दिल जानता है।
क्या होता है तन्हापन क्या होती है बदनसीबी
ये हम जानते हैं या हमारा दिल जानता है।
कहते नहीं हम दुखड़ा अपना सुना है तमाशा
बेशुमार होता है।
चुप रह कर अल्फाज़ में सिमटती हमारी खामोशी
बयां करती है क्या होती है बोझिल सी जिंदगी
ये हम जानते है या हमारा दिल जानता है।
घुटन क्या होती है टूटता सब्र क्या होता है
एक कमरे की कैद जिन्दगी क्या होती है
ये हमसे पूँछों ये हम जानते है या हमारा
दिल जानता है,
दर्द समेट कर रखा है कितना ये हम जानते हैं
या हमारा दिल जानता है।
समझ न सकेगी ये दुनिया दर्द हमारा
ये हम जानते है या हमारा दिल जानता है।
दुनिया
दुनिया
जीवन का आधार है दुनिया हर ग़म के साये
से अछूती नहीं दुनिया
पा लो तो खुशी खो दो उदासी सिक्के के दो पहलू
सी लगती है ये दुनिया
जीवन की हर ॠतु से सजी है दुनिया,हर पहलु
में ढ़ली है दुनिया
बेहतरीन सा हो एक ऐसा मौसम तन्हाई से
जुदा हो हर एक दुनिया का कोना
ग़म में सिमटती सी लगती है ये दुनिया
हर वक्त का दुखड़ा रोना बेमतलब का है ये रोना
बरसात ग़मों की किस राह की पर छत बरसे
किस राह की छत को छोड़ना है
हर दिल में घनघोर घटा सी है छाये ये दुनिया
न समझे पीर पराई,
वक्त वक्त की बात है हर वक्त में कुछ
न कुछ होना है
दुख हो या सुख इस दुनिया के सानी है
इनके बिना न एक पत्ता हिले हर जीवन से
जुड़ी ये कहानी है।
कुछ दूर हँसाती है कुछ दूर रूलाती है ये दुनिया
के संगी साथी जीवन का सार समझाती हैं
दौलत की ताक़त
जब तराजू में औहदा और दौलत की तुलना है होती
जीत जाती दौलत औहदा हमेशा की तरह हार जाता
घुटने टेक देती इंसानियत दौलत सिर उठा कर जीती
हावी होती इस कदर अपनों को भूला देती,घरों में
दीवारें ये करा देती,
शिक्षा,रोजगार,नौकरी रिश्वत का रूप ले ख़ुद पर
बड़ा इठला रही।
अमीरों की तिजोरी में शान बढ़ा जाने कितना घमंड
दिखाती।
गरीब को हर लम्हा ये परख़ती ना उम्मीद है उनकों
करा रही।
बड़ी डिग्री हासिल किये युवा को नौकरी पेशा से
वंचित करा रही।
दौलत की ताक़त तो देखों अपनी एहमियत का कितना
एहसास करा रही,
न रहने दे सुकूँ से इंसानों को अपना रूतबा दिखा रही
दौलत की ताक़त है ये दौलत की ताक़त अपनी उंगली पर
इंसानों को नचा रही,
ग़म हो या हो ख़ुशी का माहौल हर तरह से अपना
जलवा दिखा रही,
गिरा देती ईमान किसी का इस कदर ललचा देती इंसान को
दौलत ही ख़ुद को ईश्वर का दर्जा दिला रही।
इंसान की जिंदगी बन बैठी ये दौलत दिन रात की नींद
ये उनकी उड़ा रही ।
दौलत की ताक़त है देखो इंसान का खून पसीना बहा रही।
किसी को घर से इतना दूर करती सात समंदर पार पहुँचा देती
दौलत की ताक़त भी बड़ी निराली हर तपके के इंसान को अपना गुलाम बना रही।
वाह री दौलत तेरी ताक़त किसी को आसमां तक किसी को जमीं पर ला रही।
बिखरते फूल
बिखरते फूल
संभाल कर रखों फूलों से कोमल भावों
वाले रिश्तों को,
अक्सर एक गलतफहमी रूपी कीड़ा
ग़र लग जाये तो रिश्ते बिखरा देता है
अपने अटूट विश्वास रूपी खाद और
सम्मान रूपी नीर से ग्रहण करो
ग़र तुम्हें अपने माली रूपी बड़े की कोई
काँटा रूपी बात चूभती है तो हमेशा याद
रखना काँटा रूपी सलाह आपको भटकने
से रोक लेती है,जैसे फूलों की हिफाज़त
काँटों से होती है,वैसे ही तुम्हारी हिफाज़त
बड़ो की दी गई सलाह से होती है,
हर रंग के रिश्तो के फूलों से सजी बगिया
आपके माली रूपी बुजुर्गो ने बड़े परिश्रम
से सजाई है,
इस गुलज़ार रिश्तो के गुलिस्तां को तुम
पतझड़ में न बदलने दो,
मिलती है उनकों ख़ुशी जब उनके हर रंग
के रिश्ते उस बगिया में खिलते हैं
उनकी इस मुस्कान को उदासी में न
बदलने दो।
आदर सत्कार
आदर-सत्कार
प्रेम कराये भावों का आदर सत्कार
नीर कराये प्यास का आदर सत्कार
उत्तर कराये प्रश्न का आदर सत्कार
फल कराये कर्म का आदर सत्कार
इन्सानियत कराये सेवा भाव का
आदर-सत्कार
विचार धारा कराये सकारात्मकता
का आदर-सत्कार
रिश्ते कराये इंसान का आदर-सत्कार
सत्संग कराये ईश्वर का आदर-सत्कार
इम्तिहान के तजुर्बे कराये सुकून भरे
जीवन का आदर-सत्कार
दुख रूपी धूप की तपिश कराये सुख
रूपी छाया का आदर-सत्कार
एहमियत कराये वक्त का आदर-सत्कार
तब होता सम्पूर्ण रूप से जीवन में
खुशहाली भरा आशियां।
मरने के बाद
न कर अभियान इतना धन पर तू बंदे
बाद मरने के साथ तेरे न जायेगा
रह जायेगा सब यहीं जग से तू
खाली हाथ जायेगा
न कर तेरा मेरा इतना तू बंदे बाद
मरने के साथ तेरे न जायेगा
आज जो तेरा है कल किसी और
का हो जायेगा,न कर अंहकार इस
तन पर बंदे बाद मरने के साथ तेरे
न जायेगा,
कंचन जैसी काया तेरी राख रूप
ले नीर में बह जायेगी,
न कर तू अपमान किसी का न बोल
कठोर वाणी बंदे बाद मरने
के तेरी मधुर वाणी की मधुरता से
याद तुझे किया जायेगा।
कर ले जग में कुछ ऐसा कर्म जब भी
तेरे कर्म को याद किया जाये।
तेरी अच्छाई से तुझे जग में
मशहूर किया जाये।
आपके पहलू की छाँव
आपके पहलू की छाँव के सिवा और कोई
अपना नजर नहीं आता माँ
इस बेबसी भरे जीवन में एक तुम्हारे सिवा
हमारी भावनाओं को समझने वाला और कोई
अपना नजर नहीं आता माँ,
एक तुम ही हो माँ जो हर कदम हमारे जीवन
के हर उतार-चढ़ाव भरे समय में हमेशा हमारे
साथ खड़ी रहा करती हो माँ।
चाहे तुम कितनी भी तकलीफ से गुजरो मगर
कभी जाहिर नहीं होने देती हो माँ
जानते है कि हम तुम को बहुत परेशान करते हैं
इतनी बिमार होने के बाद भी तुम हमारी देखभाल
करती हो माँ,समझती नहीं हमें बोझ कभी हमारी
इतनी परवाह करती हो माँ,
दुनिया भले साथ न दे मगर तुम हमारे हर एक दुख
को समझती हो माँ,
माँ और पिता दोनों का फ़र्ज आप बखूबी निभाती
हो माँ,
बिगड़ते हालात
बिगड़ते हालातों को देखकर हर आशियां में
छा गया सहमापन,
उड़ गये रंग खुशी के लम्हों में लग गया ग्रहण
खुशहाली में,
कहीं बिखरे आशियां तो कहीं पसरा सन्नाटा
कहाँ जाकर रूकेगा ये बिगड़े हालातों का तूफां
प्रकृति भी खेल रहीं जानें कैसा खेल,
करके अपनों को अपनों से जुदा मंद-मंद मुस्कुरा
रही, करके कैद जिन्दगी सभी की प्रकोप अपना
दिखा रही,
कहीं छीनती साँसों को तो कहीं घुटन महसूस
करा रही,कीमत लगा कर साँसों की तू खरीदने
पर मजबूर करा रही,
अपनों का मुख देखने को तरसे अपना इतना
है तरसा रही,
अंतिम दर्शन भी न करने दे जाने कैसा दस्तूर
बना रही।
अंतिम संस्कार की सम्पूर्ण विधि से वंचित कर
कोरोना का भय फैला रही।
सुख दुःख के साथी
सुख दुःख के साथी
कृष्णा-सुदामा की जोड़ी थी बड़ी बेमिसाल
एक था ब्राहमण का छोरा तो दूजा दवारका
का राजा
एक झोपड़ी का रहने वाला तो दूजा महलों
का नदंलाल
नहीं पड़ा कोई प्रभाव स्वार्थता का,रहा सदा
निस्वार्थ भाव
सुख-दु:ख के दोनों साथी,थी डोर बड़ी अटूट
विश्वासी।
बचपन के थे दोनों साथी गुरुकुल की शान थे।
रहते संग हर पल दोनों सुख दुःख होते साँझा
दोनों के साथ थे,
एक को होता दुख तो दूजे को पीड़ा सताती।
मित्रता की मिसाल बन सुख दुःख के साथी
का कर गये दोनों अमर कहानी।